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Navneet Bhengraj Bunty

जो व्यक्ति एकांत में खुश रहता है, या तो वह एक जानवर हो सकता है या फिर भगवान

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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - बड़ी खूबसूरत हो, थोड़ा देख लूँ क्या?
तुम्हें, अपने ही दिल में रख लूँ क्या?
ता - उम्र बस, तेरा ही मेहमान बनूँ क्या?
तेरे ही दिल का एक छोटा सा जहान बनूँ क्या?


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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - नज़रें मिलाऊँ तो शर्म से झुक जाती हो,
बिना कहे ही बहुत कुछ क़ह जाती हो,
इस मौन संवाद को ईबादत कहूँ क्या?
तेरी रूह की पाकिज़गी में रहूँ क्या?

मेरे वीरान दिल में बहार बन कर आई हो,
तन्हाईयों में मेरी तुम, करार बन कर आई हो,
इस रिश्ते को कोई मुक़म्मल नाम दूँ क्या?
तेरी हसरतों को कोई ऊँचा मुक़ाम दूँ क्या?

तुमसे शुरू और तुम पर ही खत्म हूँ मैं,
तेरे ईश्क़ की राहों में बस, एक नज़्म हूँ मैं,
यह नज़्म, तुम्हारे ही नाम कर दूँ क्या?
सफ़र - ए - ज़िन्दगी को तेरे नाम कर दूँ क्या?



कुंदन राज दत्ता "निश्छल" - Made using Quotes Creator App, Post Maker App
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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - चाँद भी फिका लगे तेरे नूर के आगे,
सो जाते हैं सारे दर्द इस सुरूर के आगे,
तेरी सादगी पर खुद को वार दूँ क्या?
ज़िन्दगी का हर लम्हा तुझ पर उतार दूँ क्या?

तुम कोई हकीकत हो या हसीं ख्वाब हो,
हर सवाल का मुक़म्मल सा जवाब हो,
सपनों के इस जहाँ में तुझे रोक लूँ क्या?
अपनी खुशियों को तेरे आँचल में झोंक लूँ क्या?

ज़ब चलती हो तो पायल भी गुनगुनाती है,
हवाएं भी तेरा ही पता दे के जाती हैं,
इन सुरमई राहों पर हाथ थाम लूँ क्या?
तेरी वफ़ा का, खुद को गुलाम मान लूँ क्या?

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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - बड़ी खूबसूरत हो,
थोड़ा देख लूँ क्या?
तुम्हें अपने ही दिल में रख लूँ क्या?
इन नशीली आँखों में डूब जाने दो,
खुद को तुम्हारी चाहत में खो जाने दूँ क्या?

तुम्हारी मुस्कुराहट, जैसे सुबह की ओस,
मिटा देती है मन का सारा अफ़सोस,
इन होठों की ख़ामोशी को पढ़ लूँ क्या?
तुम्हारे करीब, एक कदम, और बढ़ लूँ क्या?

चेहरे पर गिरती यह ज़ुल्फ़ों की घटा,
जैसे अम्बर पर छाई हो सावन की छटा,
इन रेशमी डोरियों को सुलझा दूँ क्या?
अपनी धड़कन का तुझे, पता बता दूँ क्या?


कुंदन राज दत्ता "निश्छल" - Made using Quotes Creator App, Post Maker App
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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - चैत्र नवरात्रि की कल है आख़री रात,
पर, कोई ज़्यादा न करता इस नवरात्रि के बारे में बात,
कन्या पूजन तो कल है ही साथ - साथ,
मना भी लेते हैं जन्मदिन भी लगे हाथ,
क्या? किसका जन्मदिन?
जिनके आने के लिए अवध में सब ने गिने न जाने कितनी रातें और दिन,
तीनों से पहले आते वह, भाइयों की चौकड़ी होती ना पूरी उनके बिन,
भाइयों संग गए वशिष्ठ के आश्रम,
बिताए अपने शिक्षा के दिन, जाते हर काम में तन्मयता से रम,
विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए चल पड़े भाई संग, मारा ताड़का को, और किया मिथिला में शिव धनुष भंग,
जनकसुता को ब्याहा, बने जानकीनाथ,
चारों भाई ब्याहे जानकी की बहनों से और संख्या हुई आठ,
पितृ वचन के मान हेतु चले पत्नी और भाई संग गए वनवास, असुरों से पीड़ित ऋषियों को उन में दिखी आस,
खेल उस राक्षसी सुन्दरी का था ऐसा, आया लंका नरेश छल के लिया जनकसुता को धोखे से जैसा,
बजरंगबली और सुग्रीव संग बढ़ाया लंका की ओर पग,
जानकी की मुक्ति के बिना न लौटे वह अवध जग,
जीत के आए लंका से, अवध में बजा मंगल गान,
मनाई संसार की पहली दिवाली, ज़ब आए वापस सभी के चहेते भगवान श्री राम 

नवनीत भेंगराज  - Made using Quotes Creator App, Post Maker App
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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - हमारे दुनिया में आने का वह ज़रिया बनती है,
दुनिया को देखने का नज़रिया हमें समझाती है,
पूरा अपना ज़िन्दगी हमें बड़ा करने के लिए  वह लगा देती है,
हमारे हँसने में उसका हँसना है,
हमारे रोने में उसका रोना है,
वह अगर बड़ी है तो डाँट से बचा लेती है,
जो छोटी है तो साथ रह के उसे निगलने में मदद करती है,
साईकल में पीछा बिठा के घुमाने तक, हमारा हर नखरा वह झेलती है,
खुद के बढ़ता उम्र में और पोपले मुँह में भी हँसी लिए और कमज़ोर शरीर में भी हमें मालिश करने से ले के गोद में उठाए बगीचे में घुमाने तक, वह यह मेहनत ख़ुशी - ख़ुशी करती है,
आगे चल के वह हमें स्कूल / कॉलेज / ऑफिस में मिलती है, उसे एक बार देख के भी फिर मन नहीं भरता और उसी के साथ हमेशा के लिए रहने के लिए हम उसके साथ फेरे लेते हैं,
माँ, दादी, नानी, मौसी, बहन, प्रेमिका, सब उन्हीं के ही ज़िन्दगी के अलग - अलग पड़ाव के रूप हैं, और इन्हें हमारे अलावा कोई और दिखता नहीं और इन्हें कभी खुद के लिए एक पल या दिन मिलता नहीं अपने तरीके से जीने के लिए,
हम तन से इनसे ताकतवर भले ही हो, पर मन से यह हमसे ज़्यादा ताकतवर हैं,
हमारे अन्दर का बच्चा जो कभी बड़ा होना नहीं चाहता उसे यही तो देखती हैं,
ज़ब इन्हीं से ही सब कुछ हमारा जुड़ा हुआ है, तो क्यों हम हमारे ऐतिहासिक राक्षसों का पदचिन्ह पर चल के इन्हें तिरस्कृत, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, आदि तोहफ़े देते हैं, ज़ब की राक्षस ना ही हमारे पूर्वज थे और ना ही उनका मिसाल दे के भारत को याद किया जाता है।
 
डू देय डीज़र्व दिस?


नवनीत भेंगराज  - Made using Quotes Creator App, Post Maker App
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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - मालपुआ, गुजिया, ठण्डाई, भांग,
बच के रंगों के टब से निकल, मार के छलांग,
भूत - भूतनी बन के चेहरे संग शरीर है रंग से सराबोर,
सुनने को मिले हर गली से "होली है" का शोर,
नीला, पीला, हरा, गुलाबी, लाल,
रगड़ दियो गाल, लगा के ग़ुलाल,
गुब्बारों में रंग भर के फ़ेंके छोरे और करें गीली छोरियों की चोली,
राधे संग कृष्ण घूमे डोल पूर्णिमा में गली - गली सजाए के अपनी डोली,
मीठा - नमकीन जो भी बने, मज़ा लें और खाएं स्लोली स्लोली,
सफ़ेद कपड़े पहन न निकलें कोई काम पर,
कहीं दौड़ाने न  लग जाएँ, आपको रंगबाज़ों की टोली,
भूल से न लेवें भांग की गोली,
भर लियो बड़ों के आशीर्वाद से आज आपन झोली,
आज हई के दिन, केहो पर न होवे बिस्वास, कोई न देखन को मिले भोला या भोली 
रउरे मन के और रउरे के परिवार मन के हमार तरफ से मुबारक त्यौहार - ए - होली 


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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - तिरंगा है शान हमारी,
तिरंगा है जान हमारी,
कहते हैं लोग सभी,
फिर, क्यों ना उठाते ज़िम्मेदारी कभी?

क्यों ना रहती सड़कें साफ?
क्यों ना रहती दीवारें हसीन?
क्यों ना करते हम,
तिरंगे का मान कभी?

आज तिरंगा आसमान में लहराता,
कल वही मिलता, कूड़ेदान में खिलता,

आज गणतंत्र दिवस सब मनाते हैं,
पर वोट उसको जो ज़्यादा पैसे खिलाते हैं,

तिरंगा हमारा है, तो ज़िम्मेदारी हमारी है,
थोड़ी सी सूझ - बूझ और समझदारी दिखाओगे तो,
अब की बारी, जीत गणतंत्र की है,


सवाली जोशी  - Made using Quotes Creator App, Post Maker App
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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - अगर तुम साथ हो,
तो वक़्त भी ठहर सा जाता है,

हर पल में सुक़ून उतर आता है,
दिल खुद को फिर से पाता है,

अगर तुम साथ हो तो,
आँसू भी मोती लगते हैं,

दर्द, कहानियाँ बन जाते हैं,
और, ज़ख़्म भी अच्छे लगते हैं,

अगर, तुम साथ हो तो,
मैं, मैं नहीं रहता,

एक बेहतर इंसान बन जाता हूँ,
बस, तुम्हारी वजह से,

तमन्ना माहेश्वरी  - Made using Quotes Creator App, Post Maker App
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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - २०२५ के १२/२५ होने में है बस एक दिन का फासला, 
६ दिन बाद जो आएगा उसके लिए भर लो अपने अन्दर जोश, उमंग, उत्साह, और, हौसला,
रुठों को मनाते चलो, हाथों में खाली जामों को पूरा भरो,
क्योंकि, पार्टी हो या पिकनिक, रुखा - सूखा रास नहीं आता है, असली मज़ा तो सब के साथ आता है,
बन सको तो बनो किसी के हँसने की वज़ह, और हो सके तो पोंछ दो किसी के आँसू जो निकले बेइंतहा,
मज़े - मज़े में अपना काम और ज़िम्मेदारी को न भूलना,
जिससे नए साल तक तुम्हें सड़ा हुआ चेहरा ले के पड़े घूमना, साल आखिर के मौके पर जिस खास से जो नहीं कही अपने दिल की बात, अब क़ह डालो जमाते हुए हक़,
हमार बाटे से रउरे मन के क्रिसमस और नया साल मुबारक 


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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - दीपों की कतार से सज उठे घरों के द्वार,
मेहमानों की भीड़ संग आए मौसम में थोड़ी ठण्ड की बहार,
लक्ष्मी, गणेश, कुबेर, काली, की पूजा का लगातार चले मन्त्रोच्चार,
पूजा बाद, मीठे - नमकीन पकवानों का लग जाता अम्बार,
खाते - खाते, पेट भी जाता, और खाना लेने से हार,
चचेरे - ममेरे भाई - बहन और दोस्तों संग शुरू हो जाती हँसी - ठिठोली और बातें दो - चार,
बड़े - बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने पर वे लगा देते दुआओं संग पैसों का पहाड़,
प्रकाश के पर्व पर किसने जोड़ा प्रदूषण फैलाने के लिए पटाखे, और धन - हानि के लिए ताश खेलने का व्यवहार?
सुःख - समृद्धि - शान्ति विराजे हम सभी के द्वार से द्वार 
मुबारक हो, आप सभी को दीपावली त्यौहार 🪔🪔🙇🏻‍♂️🙇🏻‍♂️🙏🏻🙏🏻


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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - उसे अगर, सेकण्ड माँ कहें, तो गलत नहीं होगा,
एक माँ के बाद, फिर वही तो गोद में ले पूरे गली - मोहल्ले में हल्ला मचाती है के हम आ गए हैं।
खुद हमें बड़ा करने के चक़्कर में कभी - कभी वह खुद बच्ची बन जाती है।
छोटी सी अगर लग जाए जो चोट हमें, तो मम्मी - पापा से ना गलती होने पर भी वो सुनती है।
जो न खाए हों रात में खाना, तो भूख सताने पर वही थाली लिए, खुद की नींद से लड़ कर हमें खिलाती है।
बड़े हो जाने पर, हमारी बदमाशीयों को, राज़ बना कर खुद के पास, मम्मी - पापा से बचा के, महफूज़ रखती है।
कितना भी उससे लड़ लें, पर ज़ब मम्मी - पापा सुनाते नालायक होने का ज्ञान, तो वही फिर हमारी एहमियत उन्हें समझाती है।

एक दूसरे की पोल खोलने के लिए करते हैं पैसों का हेरा - फेरी और ब्लैकमेल, कम्बख्त यह पापी मुँह, पैसे मिलने पर भी खोल के पोल फँसा देने का खेलता है खेल।

जो मार - पिट में ज़्यादा गुस्सा हो और रूठ जाए तो कहती है के "कल ज़ब विदा हो के चली जाऊँगी, नहीं रहूँगी, तब याद करेगा मुझे" 

भाव तो हम भी खा के कह देते हैं के तेरे जाने के बाद तेरा कमरा मेरा, तू गई तो करेंगे पार्टी।

सालों बाद, काम के सिलसिले में ज़ब हो अलग शहर में रहना, सब से दूर और आज ही के दिन दिखे अपना सूना कलाई, तब समझ आता है इस वाक्य का मतलब "कल ज़ब विदा हो के चली जाऊँगी, नहीं रहूँगी, तब याद करेगा मुझे"


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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - जितनी चादर, उतने पैर फैलाओ,
यह सीख भी वही देते हैं, पर बात ज़ब हमारे बेहिसाब पैर फैलाने क़ी आए, तो वही उस चादर को हमारे लिए कभी कम होने नहीं देते हैं।

उनके हर महीने का पगार, घर का राशन, ज़रूरतें,
बच्चों क़ी पढ़ाई, उनके जेबखर्च, सब में बीत जाता है,
धूप में, ठण्ड में, बरसात में, एक भी दिन न छुट्टी ले हमारे लिए अपनी बिगड़ी सेहत से लड़ के वो इंसान काम पर तैनात रहता है।

हर महीना उनके फ़टे जूते, फ़टे कपड़े, फ़टे रेनकोट तक को वो सिलाई न करे, ज़्यादा खर्च क़ी चिन्ता में वो इन्हीं फटी चीजों से अपना काम है चलाए।

सब को मम्मी का प्यार भरा आँचल ही दिखता है, पर पापा के स्नेह से, खून, पसीने, से भरा रुमाल भी कोई कम नहीं है दोस्तों, उन्हें बस, जताना और दिखाना नहीं आता है।

क्यों ना, आज, उनके दिन पर, करें उनके लिए कुछ खास? जिससे पूरे दिन उनके चेहरे पर रहेगी मुस्कान वो भी बेहिसाब।

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - अब, किसी से कोई शिकायत नहीं करेंगे,
अब, किसी से कोई उम्मीद भी नहीं रखेंगे,
रोकने का कोई फायदा नहीं, तो जाने वाले को जाने दे देंगे,
झुके हुए काँधे, झुकी हुई भीगी पलकें लिए हर महफ़िल से अब, रुख़सत हो लेंगे 
तोहफ़े के नाम पे, आख़री बार, खुशियाँ सब को लूटा और सौंप जाएँगे,
निभा नहीं सकते, इसलिए अब, कोई कसम -ए - वादे भी किसी से ना करेंगे,
ज़िन्दगी तो बेवफा है, एक न एक दिन ठुकराएगी,
मौत सच्ची माशूका है, वो गले लगाएगी 
बस, चादर तान के ज़मीन के अन्दर सो जाएँगे,
और कोशिश यही रहेगी के, किसी को फिर कभी ना याद आएँगे।

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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - देख कर मुझे,  फिर वो अनदेखा सा हुआ 
राह में मिल के, वो अनजाना सा हुआ 
खोजूँ उस शख्स का अक्स, ताकी उसे लिख कर उतार सकूँ मैं,
पर न जाने, यादों - ख्वाबों - ख्यालों से वो कैसे और क्यों गुम हुआ?
सोच - सोच के उसे, बीत जाते ऐसे ही खाली से मेरे दिन और रैन,
एक झलक को तरस जाऊँ उसके, हो कर के बेचैन,
रास्ते पर टिक के दर्द से तड़पे भी मेरे नैन,
कब होगा सितम का यह सिलसिला खत्म?
अजनबी कौन हो तुम?

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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - वो सब चीजें परहेज़ करने से ले कर, सब दर्द सहते हुए 
हमें दुनिया में लाती है, इसके लिए वो कभी ना हक़ जताती है और ना ही बदले में हम से कुछ माँगती है।

जिसकी हँसी हमारे हँसने से है, जिसका रोना हमारे रोने से है,

जिसका ज़्यादा प्यार और फ़िक्र करना हम कभी समझ ही नहीं पाते,

जो डाँटने पे उतर आए तो सुनाने में, सब कुछ एक कर देती है,

जो दुआ देने पे उतर आए तो दुआओं की झड़ी लगा देती है,

हमारे हर ख़ुशी या ग़म में उसकी आँखें और दुपट्टा गीला हो जाता है,

कोई यह बताए, खुद को भूल कर अपना सर्वस्व कोई कैसे बच्चों पर लुटा सकता है?

उसके चेहरे की रौनक़ के सामने फीके पड़ जाते दुनिया के सभी हीरे - मोती हैं 

क्या सभी माँ ऐसी ही होती हैं?

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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - तेरी आँखों के खज़ाने में छिपा था,
मुसाफिर का दरिया,
और, तेरे दिल के खज़ाने में वो दरिया का नमक 

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - गुब्बारे मार कर रंग दी चोली,
पिचकारीयों से मारते गोली,
रंगों से पूरा रगड़ डालने बदन आपका आती होगी रंगबाज़ों की टोली,
पकवानों का आनन्द लें स्लोली - स्लोली,
गलती से न ले लेना भांग की गोली,
नहीं रहता आज किसी पे भी भरोसा, कोई नहीं है आज भोला या भोली,

मुबारक हो सभी को त्यौहार - ए - होली 🙏🏻🙏🏻🙇🏻‍♂️🙇🏻‍♂️😁😁

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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - दुनिया होती उसकी बहुत ही छोटी,
उम्र बीत जाती उसकी दौड़ते हमारे पीछे,
खुद शारीरिक या मानसिक तकलीफ़ हो उसे चाहे जैसे,
फिर भी, खुद को मना कर, धक्का दे कर, खुद को उठा कर, बिना रुके वो दौड़ती दाएं - बाएं और ऊपर - नीचे,

रूप तो कई हैं उसके, हर दिन देखने को मिलता उसका एक नया किरदार, सब के सोने पर वो सोती, और सब के उठने से पहले वो उठती चाहे बजे क्यों ना सुबह के चार?

पसंदीदा मर्द / औरत का ट्रेंड है बहुत चलता आज कल,
फिर क्यों आता है उसके लिए ऐसा पल, ज़ब हमारी नज़रों को ना पाए वो झेल, और पूरा खुद को ढक के जल्दी दौड़ पड़ती वो थल - थल?

उसके बिना रह नहीं सकते, उसे हम यह कह नहीं सकते।
तो क्यों नहीं, वो किसी भी क्षेत्र में कर काम, डर के मारे, रोकती खुद को हँसने से?



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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - कितने अच्छे हो तुम,
कितने प्यारे हो तुम,
जो भी तुम्हें जानता है,
सब की आँखों के तारे हो तुम,

और, एक हम हैं, 🤔
कि झूठ पे झूठ बोले जा रहे हैं 
😜😜




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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - छह दिन बाद इस साल का विदाई होगा और नए साल का स्वागत होगा, सभी इसी भागम - भाग में हैं लगे। पर, उससे पहले ज़रा हम, ईश्वर पुत्र को याद कर लें। जो बन न सकें अगर उनके जैसा, कोई बात नहीं। पर अगर खूबियों से उनके कुछ सीख सकें और बना सकें अपना जीवन बेहतर, तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं।

सर्द हवाओं वाली ठंडी रातों में, एक अस्तबल में प्रकाश फैलाता हुआ वो आया। पूरा जगत उसके दमकते मुखड़े से जगमगाया।

पापी के पाप को निकाल कर उस से प्रेम करो इस सीख ने सभी के ज़िन्दगी में लाया खुशियों की बहार। उपदेश उनके होते सीधे - सादे, पर अमल में लाने से जीवन में हो जाते कई चमत्कार।

गोल - मटोल से लाल कपड़ों वाले, सफ़ेद दाढ़ी और बालों वाले बाबा को सुनाते वो अपना फरमान, क्योंकि, खास अपने जन्मदिन पर चाहते वो के हर बच्चे के चेहरे पर हो मुस्कान, इसलिए होते फिर उपहारों की बारिश, परियाँ स्वर्ग से उतर कर घण्टा बजा - बजा कर सबको उनके आने का पता चल सके, ऐसा करती हैं साज़िश।

हँसी - ख़ुशी, खेलना - खिलाना, और आने वाले मेहमानों की कतार रूकती ही नहीं बस, 

मुबारक हो आप सभी को एडवांस नया साल और क्रिसमस 



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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - निर्दयी दुनिया के तौर - तरीकों से अनजान रहती है वो,
पहचान बनाने की भीड़ में खोई सी रहती है वो,
"क्यों न रखती तू अपना ख्याल?" यह सवाल रहता उस से मेरा, पर जवाब न दे कर और मुझे उलझा देती है वो,

क्या और कैसे कहूँ के उसके भोलेपन और मासूमियत को न समझने वाले और कुचलने वाले हैं बहुत, ज़माने में।
पर अल्हड़, नादान, पगली सी, मस्ती में अपने खोना जानती है वो,

वादा है मेरा यह के ऐसे ही पतंग सी आज़ाद उड़ चले जहाँ उसका मन करे, पर यह न भूले के उस पर हर तकलीफ़, हर मुसीबत की आँच को आने से पहले टकराना होगा मुझसे। क्योंकि मैं हूँ उसके साथ, अकेली नहीं है वो।

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - रात को जो भर दे रौशनी से,
 ऐसे दीपकों की पंक्ति सज गई है,
क्या बच्चे - क्या बुड्ढे, जगमग,अताह, प्रकाश को देख सभी की आँखें ख़ुशी से भर गई है,
पटाखों और पकवानों पर हाथ बढ़े ज़ोर - शोर से,
आकाश भर जाए, रंगीन नज़ारों से चहूँ ओर से,
होठों पर मीठी मुस्कान लिए, हाथों में सोन पापड़ी पकड़े 
मेहमान जाते सभी के घर - बार,
लक्ष्मी - कुबेर आए आपके यहाँ, 
तो स्वागत के लिए खोले रखें घर के द्वार,
सुःख, शान्ति, समृद्धि की मनोकामना हो सभी की पूरी,
प्रकाश का त्यौहार मनाते समय सभी के बीच खत्म हो जाए सालों की दूरी,
एनवायरनमेंट फ्रेंडली मनाने की इच्छा का करूँ सबसे मैं इज़हार,
मुबारक हो आप सभी को दीपावली का त्यौहार 


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - ग़मगीन लोगों के भीड़ में, कभी आ फँसा था मैं,
सोचा के हँसा कर सभी का दिन बना दूँ मैं,
भले ही, मेरे रुख पर भी था ग़म का पतझड़,
फिर भी, हँसी की बहार दूसरों के लिए लाना चाहता था मैं,
कई बार लतीफे मेरे लोगों का ना आए समझ,
फिर भी कोशिशों को देख, ताली बजाते हुए उन्हें देखता था मैं,
परायों को हँसा - हँसा कर लोट पोट करते हुए लगता था जैसे मार दिया कोई बड़ा तीर मैं,
पर बात ज़ब आया अपनों का, तो उन्होंने जैसे, ओढ़ा था ग़म का ही चादर ताउम्र,
क्योंकि यहाँ पर, ज़ब मेरे लतीफे का रज़ाई जो  उनको दिया 
तो पत्थर दिल सा हो के उसे ठुकरा फ़ेंका 
जिसे देख अपनी कोशिशों पर कमी अब देखने लगा हूँ मैं 
दुनिया का यह रंग मंच, जहाँ सब को हँसाने का उठाना चाहता था मैं बेडा,
अब वहीं से हताश, निराश सा गुज़रने लगा हूँ मैं,
तज कर फ़ेंक दिया मैंने भी अपने हँसाने कई विद्या को,
क्योंकि, इन सरफिरों का क्या हो ईलाज? यह नहीं जानता मैं 😔😔

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - अपने को रख ताक पर, दूसरों के लिए वह जीती है 
उसकी सुबह, हम सब के जागने से पहले होती है और रात हम सब के सोने के बाद होती है 
दिन भर वो कामों में उलझे रहें तो ठीक, ज़रा सा दम लेने या थोड़ा आराम करने अगर बैठे, तो सब को मिर्ची लगती है,
दे दे अगर बेटा, तो बड़े नसीब वाली कहलाती है,
दे दे अगर बेटी, तो वंश का दीपक बुझाने वाली कहलाती है,
किसी को घर में हो ज़रा सी खांसी, तो उसकी तबियत दुरुस्त करने वो ज़मीन - आसमाँ एक कर देती है, पर ज़ब वो ही हो जाती बीमार, तो रुक से जाते सारे घर के काम और बच्चों की पढ़ाई, क्योंकि, वो आराम करने लेटी है।
बेटी से बहन, बहन से बहु, बीवी और एक माँ वो बन जाती है, फिर भी उसका आराम, उसका खान - पान, उसकी तबियत,देख - भाल आदि बातों को हर वक़्त किया जाता नज़रअंदाज़ क्योंकि, इंसान तो है ही नहीं वो, मशीन और नौकरानी की उपाधि उसे प्राप्त होती है।

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - जो साथ भीग कर, पैदल स्कूल चलना,
जो होमवर्क न करने पर, साथ में टीचर से गाली खाना,
जो रिसेस में, टिफ़िन न लाने पर, अपने टिफ़िन से बड़ा हिस्सा दे कर खिलाना,
जो साथ में, स्कूल, ट्यूशन गुल कर के, पेडल मारते - मारते लॉन्ग ड्राइव के लिए जाना,
जो पहले लव से पहले ब्रेक अप तक, हौसले बढ़ाने से ले कर, ठूँसने तक साथ रहना,
जो हुई कभी तकरार, तो रूठ कर मुँह फेर लेना, पर जल्दी मान भी जाना,
जो अपने माँ - बाप की नज़र में कभी समझ न आते, उसे लेकिन तुरन्त समझ जाना,
जो खुद मज़ाक़ में मारे तो सही, पर किसी और के हल्के से हाथ लग जाने पर, लड़ पड़ना,
जो कभी सीधे नाम से न बुला कर, गालियों से ही सम्मानीत कर के बुलाना,
जो कड़की चलते वक़्त भी, खाली जेब से, एक बार माँगने पर उधारी देना,
यही सब यादें ही रह जाती हैं, संग सभी के,
यादें देने वाला और साथ यादें बनाने वाला तो सभी,व्यस्त से हैं,
ज़िन्दगी की भाग दौड़ में,
फिर भी, दोस्त तो होते ही हैं, के हो ना, कभी हम अकेले 
और जीएं ज़िन्दगी चौड़ में,
जो आईं हो भले ही हमारे बीच में दूरियाँ, सह लेंगे 
हम दोस्त थे, हैं, और हमेशा रहेंगे 



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Navneet Bhengraj Bunty
Quote by Navneet Bhengraj Bunty - बेवकूफी उसकी कहूँ, या नादानी,
कैसे पर, मिटने लगा उस पर, कब से यह न जान पाने की होती मुझे हैरानी, हरकतों से तंग आ कर, करता मन कस के लगा दूँ उसे थप्पड़ मैं, पर वह भोलापन और आँखों की मासूमियत देख "झेल लूँगा तुझे और ", ऐसा खुद को समझा लेता हूँ मैं।
जिस पर आना चाहिए मुझे चिढ़, उस पर क्यों पर प्यार आए? उसके नखरों और शरारतों को देख क्यों, पर मन बहल जाए। 
खुशकिस्मती कहूँ इसे या बदकिस्मती? पर उसे झेल पाना सब के बस की बात नहीं, तभी तो, कितनों को छोड़ पीछे, वह मुझसे आ मिली। 
बस, चाहूँ इतना ही के फ़ैल न जाए यह खबर हर गली,
के रूबरू हुआ हूँ जिससे, वह है सबसे पगली लड़की।

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - यारों से एक यार जुदा हो चला, संग अपने यादें लिए हो गया वह हवा, नई शादी के जोड़े को त्याग कर महान नारियों ने वैधव्य के वस्त्र अपनाए, दिन बीते भी न थे ज़्यादा, ज़ब उनकी शादी के मंगल - गान लोगों के कानों से थे टकराए,
आरती की थाल में रखे दीपक, एक माँ के न रुकते अश्रु -  धारा से बुझ जाता, ज़ब भी किसी के आने की होती दस्तक, थाली रोटि - सब्ज़ी से भर कर दौड़ते कहती के "मेरा भोलू तो इतना ही है खाता " 
सेवा निवृत बाप, जो बेटे से हमेशा रहते थे ख़फ़ा, आज वह भी उसकी याद में पिघल जाते हैं, वह वापस आ के, सहारा दे उन्हें,  ले चलेगा घुमाने इस बात को ही वह सोच मन ही मन मुस्कुरा जाते हैं।
बच्चों को भी क्या पता के चल क्या रहा है यहाँ पर? एक चमक लिए आँखें गड़ाए हुए हैं, दरवाज़े पर के उनके पिता की कोई लाएगा खबर।
छोटे भाई - बहन को वही गोद चाहिए, जिस पर उन्होंने खेल के अपना बचपन बिताया था, दरवाज़े तक बारी - बारी से लगाते दौड़ यह जानने के लिए के भईया हमारा क्यों अभी तक नहीं आता?
परिवार के साथ मोहल्ले के सभी लोग बस नज़रें गड़ाए रास्ते पर, बेसब्र हो रहे हैं, कोई कितना भी रख ले अपने पर काबू, फिर भी, न चाहते हुए भी सब रो रहे हैं।
आख़िरकार, तिरंगे से लिपट कर अमर जवान अपनी सवारी पे, चिरनिद्रा में मग्न होआया, भराए हुए गले से शहीद की शहादत को नमन करने के सभी ने एक साथ "भारत माता की जय, जय हिन्द" का नारा लगाया।
भारत माँ के लिए कुर्बान होने वाले हर वीर की यही कहानी है, जो तिरंगा ले कर आते घर तो ख़ुशी का होता माहौल, जो तिरंगे से लिपट कर आते तो निकलता आँखों से पानी है।

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - कंधों पर ज़िम्मेदारी ले कर चलता हूँ, थकना मना है, दिए हुए काम हो जाने चाहिए वक़्त पर, शिकायत करना मना है, भूख - प्यास से टूट और बेहाल हो जाता हूँ, पर रुकना मना है, अकेले, गलती होने के भी नारियल फुटते मेरे सर पर ही, पर किसी की मदद लेना मना है, कोशिशों से शायद पहुँचती होगी लोगों को ख़ुशी, पर मेरा हँसना तक मना है, कहता नहीं, फिर भी लगाते मुझसे उम्मीदें, जो खरा नहीं उतर पाता, तो भी मैं ही कसूरवार ठहराता हूँ, क्योंकि बड़े कभी गलत होते कहाँ हैं? ज़िन्दगी मेरा सिर्फ नाम का ही मेरा रह गया, इसे तार - तार करने में लोगों ने महारत हासिल किया है, कहीं कोई मुझे बता दे, के तू तो बन चुका है इच्छा पूरा करने वाला रोबोट, क्योंकि, तेरे अन्दर का इंसान अब मरा है।

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - निकले थे हम, घर के लिए राशन लेने 
पर पैर और नज़रें रुक से गए,
ऊपर छत पर उसे गीले बालों को सुखाते देखा,
खुद मेरा गला प्यास से सूख गया,
तभी उसकी नज़र मेरे से टकराई, लगा जैसे सीने में आग लग आई, जो हल्के से वह मुस्कुरा कर जाने को पलटी,
गुम हो गई मेरी सारी सिट्टी - पिट्टी।
वापस आ कर घरवालों से की ज़ब पूछताछ,
सुना के पड़ोस में नई शिफ्ट हुई वह आज,
आँखों में उसके तो दिल डूबा ही था, उसे सामने से गुज़रते देख डोलने भी लगा, ख़ास उसे देखने ही तो छत पर जा - जा कर चमगादड़ की ले ली मैंने नौकरी। आ जाती थी कभी - कभी वह लेने शक़्कर या कोई तरकारी।
घरवाले मेरे गए किसी दिन तीर्थ यात्रा पे, मैंने सोचा अकेले में लूँगा उसके साथ मज़े, वह भी ज़्यादा भाव देने और चिपकने की कर रही थी कोशिश, मैं बुद्धू देख न पाया पर वह बना रही थी कोई साज़िश।
एक दिन, उसके बुलाने पर मैं गया तैयार हो के, नहीं जनता था के खाऊँगा वहाँ पर धोखे, मिलाई ज़ब अपने पति से, तो खिसकी पैरों तले ज़मीन, कभी देख के नहीं लगा की वह होगी शादीशुदा, न कभी लगा यह मामला संगीन, बनने तो गया था सइयाँ, पति के सामने बोली यह हैं पड़ोस में रहने वाले मददगार भईया, खैर, एक तरफा ही सही पड़ोसन संग दिल लगाया था, अब भी कोई गली मोहल्ले से जो बुलाती, तो डपट कर कहता के, भईया नहीं हूँ तुम्हारा।


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - बरसात की रातों में, भीगा - भीगा सा मैं और मेरे अल्फाज़ 
अक्सर खुद से ही करते हैं यही गुफ़्तगू,
के साथ में किसी के बारिश में भीगना भी क्या भीगना होता है? क्या गुज़रती है दिल - ओ - दिमाग़ पे ज़ब कोई नाजुक पर मोटे - मोटे हाथों से अकेलेपन के मेरे आँसू पोंछता है? 
यूँ तो कई आए और गए, जिनको भीगते वक़्त कभी मैंने दिया था सहारा, अपनेपन का ढोंग कर के मुझे ही कर दिया बेसहारा, अजब जादूगरी है उनसे जुड़े हर लम्हात के की, मीठा ज़हर जो घोल कर पिलाया था मुझे,उसका दर्द अब भी मुझे तड़पाता है, फिर भी क्यों कदम और ज़हन मेरे उसी बारिश में अकेले खड़े हो उन्हीं यादों में भीग - भीग कर, खुद को बीमारी और तकलीफ़ देने का सोचता है? भीगते हुए सड़क पर खड़े मौत को देता हूँ बुला के सोना है तेरी गोद में, मुझे लेती जा, वह भी तुनक कर कहती है, इसमें नहीं है मेरी रज़ा 
क्या, यही है मेरी सज़ा?

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - देर से ही सही, पर अब हमें एहसास हुआ,
के, तू मुझे छोड़ किसी और का हुआ,
कोशिश की थी मैंने की तुझसे नफ़रत करूँ,
पर थी सिर्फ तुझसे ही मेरी उल्फत, तो क्यों न निकले मेरी ज़ुबाँ से तेरे लिए दुआ
बिकाऊ न था मेरा ईश्क़, पर दांव पर लगा के तूने खेला इस पर जुआ 
बेच डाला हमको धोखेबाज़ों की बस्ती में, ज़ब खोए रहते थे हम तेरे इंतज़ार की मस्ती में,
ओढ़ लिया बदनामी का हमने मैला चादर,
बन बैठे हम सितमगर और बेवफा, 
अब लाख लोग हमें देते ताने, पर इस ख़ुशी के मारे भर जाती है मेरी आँखें, की तू और तेरा नया आशिक का घर तो आबाद हुआ।

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - गुरुर है तुम्हें अपनी खूबसूरती का,
पर हम भी कोई कम हसीं नहीं,
बाकी आशिक, तुम्हारे दिखाते होंगे चमक - दमक,
पर, तुम्हारी कसम हमारी चाहत में कोई मिलावट नहीं,
लाख खाए होंगे तुमने चोटें जमाने भर से, 
यक़ीन मानो, लगाने आए हैं मरहम तुम्हें, देंगे और चोट नहीं,
दिल चुराने का ऐ हुज़ूर, हों भले ही तुम्हारे कई रंगीन अंदाज़,
पर हम तो उन्हीं रंगों में सादे ही सही, घुल जाएँगे तुम संग, ताकी फिर हो न सके हम - तुम अलग कहीं।
शिकायतें हों तुम्हें हमसे की बाकियों जैसे करते कुछ क्यों नहीं मेरे लिए?
पर, इतना है ही हमारा तुमसे कहना की, हों हम बेअंदाज़ और बेरंग ही सही, पर जो तुम पर अगर चढ़ जाए हमारे सादगी भरे ईश्क़ का सादा रंग, बीत जाएँगे जन्म और घड़ियाँ कईं, पर वह हम सा ही ज़िद्दी कभी तुम पर से हटेगा और उतरेगा नहीं।


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - नाटक के नकाब तो कलाकार, नाटक खत्म होने पर उतार ही देते, पर उससे हम इंसान क्यों नहीं सीख लेते?
कौन है असली, कौन है नकली? यह द्वन्द चले है दिल - ओ - दिमाग पर, चेहरे पर चेहरे लगाए हैं अपने ऊपर 
दिखावा को ही मिल रहा है बढ़ावा, बना है जैसे वह भगवान पर चढ़ाने वाला चढ़ावा। किसी ने कम समय पर ही सब हासिल किया , कोई देर से ही पर, मंज़िल तक पहुँच लूँ, इसी आस के साथ अब तक है जिया। जिसे मिला सब जल्दी, वह संघर्षरत की मदद ना करे, बल्कि अपने रौब का दिखावा कर, उसे हतोउत्साहित करे। 
अपनी ज़िन्दगी जियो शान्ति से, और दूसरों को भी जीने दो, नाकि दिखा कर, जला कर दूसरों को दुःख दो।
क्यों दिखावा करना है? क्यों किसी को जलाना है?
जबकि, सभी ने बिना किसी फर्क के मिट्टी में ही एक दिन, मिल ही जाना है।



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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - इस बार मार्च के खत्म होने पर है, त्यौहार एक के बाद एक, धूम मचेगी धूम हर गली मोहल्ले में, देख बहन देख
24 और 25 को गलती से न लेना भांग की गोली,
रंगा सियार न बना दें आपको रंगबाज़ों की टोली,
कान्हा रंगे राधे की चोली, सभी को मुबारक त्यौहार - ए - होली।
29 और 31 को है गुड फ्राइडे और ईस्टर
भर उठेंगे प्रार्थनाओं से शहर के सभी गिरज़ाघर
वह ईश्वर पुत्र की बातों को और उनके दिखाए राह को हम याद करें और समझें, तो शायद सुलझ जाए हम सभी का जीवन जिसमें हैं कई उलझनें।
काम काज़ी जीवन का सभी थकान, और अन्दर के सभी दुर्विचार को निकाल कर करें मन साफ, मनायें अपनों संग आप सभी त्यौहार, जिससे फैलती रहे सभी के जीवन में खुशियों की बहार।


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - अजब - गजब पहेली सी बन रही है सब की ज़िन्दगी,
जिसमें खो रहा है दिन का चैन, और रातों की नींद भी,
कसमें - वादे उम्र भर के साथ लिए चलने का वादा था,
प्यार - वफ़ा सब हुआ उड़नछू, क्योंकि कम वक़्त का ही सिर्फ नाता था, कोई है ही नहीं तैयार समझने के लिए, क्योंकि 
उलझ रहें हैं सब एक - दूसरे से सिर्फ अपनी समझाने के लिए,
किसको कहें गलत? सही तो सभी अपनी - अपनी जगह पर हैं, मिटा कर सभी गिला - शिकवा नई शुरुआत करेंगे ऐसे कहने और करने वाले क्यों आस - पास खड़े नहीं हैं?
एक ही खून होने के बावज़ूद सभी एक दूसरे के खून के प्यासे बन पड़े हैं, हिंसात्मक वचन और कर्म करने से पहले अपनों को चोट पहुंचे, यह सोच कर सब कैसे अपने आँसू रोक बैठे हैं?


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - अपने अब, होने लगें हैं पराए
कम मुलाक़ातों से भी न भूल मुझे, वही पराए होने लगें हैं अब अपने, उन्हीं अपनों को संग लिए देखे थे कभी रंगीन सपने
उन्हें ही जो, ज़रा सा किया मैंने नाखुश, तो उनकी ज़िन्दगी से निकाल दिखाते मुझे बेरंग हक़ीक़तें, बाकि वह पराए मेरी छोटी सी मदद के बदले अपने हर ख़ुशी में मुझे शामिल कर देते, वही अपने अब पुराने पन्ने बन गए हैं जिन्हें रखूँ या फाड़ दूँ कोई नहीं जानता, वही पराए अब नए पन्ने बन ऐसे जुड़ गए हैं, जैसे उनसे हो मेरा जन्मों का नाता। अब अनजानों से कोई खौफ नहीं मुझे, ड़र तो अपनों से अब लगने लगा है, थक गया हूँ उन्हें नाखुश कर के फिर खुश रखने की नाकाम कोशिश कर, लगता है की अब परायों के दिलों में बनाया है मैंने घर।


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - क्यों दूसरों को खुश करते - करते, मैं दुखों के समन्दर में डूब पड़ता हूँ? क्यों किसी को चाहते - चाहते उसे अपने से दूर कर देता हूँ? क्यों दूसरों का कहा करने पर शाबाशी, और अपने मन का करने पर, गाली पाता हूँ? क्यों,जो दूसरों को पहले रखूँ तो निस्वार्थी, और खुद को पहले रखूँ तो स्वार्थी कहलाता हूँ? क्यों किसी को हँसाते - हँसाते खुद मैं रो पड़ता हूँ? क्यों जो मुझसे रखते उम्मीद, उनसे जो मैं रखूँ अगर उम्मीद तो गलत हो जाता हूँ? क्यों भीड़ में शामिल होने वाले रस्ते पर चलने को कहा जाता, और मैं अलग रस्ते पर ज़ब अकेले निकलता तो ताने सुनता हूँ?
आखिर, मैं कौन हूँ?


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - वह देखने में बच्ची लगती है,
फिर भी मुझे वह बहुत अच्छी लगती है,
शायद,वह बोली हो मुझसे कई झूठ,
फिर भी यक़ीन कर लेता हूँ, क्योंकि उसकी झूठी बातें भी सच्ची लगती है, उसका रोम - रोम,
हर अंग - अंग पी लेना चाहता हूँ, ऐसी तलब क्यों सीने में मेरे मची रहती है? उसे सुनने और देखने का ही सिर्फ रोज़ मुझे यह काम करना पड़े, तो कर डालूँ मैं, उसमें मुझे समय की कोई ज़रूरत नहीं लगती है, बातों से ही उसे करता हूँ ईशारे, समझ कर भी हँसे वह दिखा कर दाँत सारे, नासमझी की जैसे उसने पी एच डी कर रखी है
फिर भी न जाने क्यों? वह बच्ची मुझे अच्छी लगती है 

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - चाय सी गर्म, नमक सी नमकीन
कॉफ़ी सी गहरी, मिर्ची सी तेज़
बर्फ सी ठंडी, गुड़ सी मीठी
गन्ने सी लम्बी, पंखुड़ी सी कोमल
हवा सी, कभी न जगह पर टिक कर रहने वाली,
लहरों सी बहादुर, झील सी आँखें
इमली और आम सी खट्टी - मीठी वाली हँसी,
इत्र की तरह हर जगह से गुज़रते वक़्त खुशबु की तरह खुशियाँ फैलाना.....
इतनी खूबियों के बावज़ूद भी क्यों कहती हो,
तुम यार? की कोई नहीं करता तुमसे प्यार?

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - मुझे दूरी ही पसन्द आए, खुशियों से भी और लोगों से भी
आता ही नहीं, समझ, के गम को मैंने पकड़ा है या गम ने मुझको, मेरी कोशिश सब को खुश रखने की, होती क्यों ना पूरी? कमियों को गिना कर क्यों लोग बताते अमानुष मुझको? दौरे मुसीबतों के कम ना होते, नींद नहीं रातों को आँखों में, शायद भूल गया हूँ के कैसे हैं सोते।
निराशा ही मेरी हँसी को कभी आने न दे होठों पर, शायद  पूछते - पूछते निकल पड़ा हूँ किसी दिन, यह जानने के ख़ुशी मिलती है किधर? बेवजह अब लगने लगे हैं ख़ुशी के मेले और उसके नज़ारे, सभी जो हो गए बेगाने तो गम से ही जोड़ लिए मैंने रिश्ते सारे 

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - पीने का शौक़ नहीं, पर क्यों उस दिन तलब मची थी
निकला ज़ब सड़कों पे, तब रात भी बिल्कुल अकेली थी
मयखाना पहुँचा ज़ब, और बैठा कोने में कहीं
जाम का प्याला उठा कर पीना चाहा, पर मन माना नहीं
दूर,मेरी नज़रों के सामने देखा था उसे,
जैसे, अकेलेपन से जूझती उसकी आँखें खोजती हो किसे 
अनमने मन से ही, चला उसकी और, पर बैठते ही उसके नज़दीक उसकी सवाल करती हुई निगाहें मेरी निगाहों से ज़ब टकराई, कुछ न बोलते बने मेरे से, फिर भी मैंने अक्ल दौडाई और कह दिया के " दिल की मेज़ पे, यह जो धूल है, सब कहें यह फिज़ूल है, पर यह धूल ही तो वसूल है
प्यार की, जो भी भूल है "


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - सड़कों पर देखा उसे, वह थी बिल्कुल अकेली
देखा था दूसरी तरफ से, पर न आई उसकी कोई सहेली
ज़ब उसकी नज़रें टकराई मुझसे, मैंने छुप - छुप कर उसे देखना किया बन्द, घबराहट छुपाते हुए चला उसकी तरफ, चेहरे पे थी मुस्कान मन्द - मन्द, वह भी क्यों, मुझे करीब पा, मुस्कुराती, शायद मनसूबे थे उसके अन्दर से शरारती। नाम पूछने पर कहती, हम अजनबी ही सही
"क्या हम मिले हैं, पहले कभी?" यह था उसका सवाल अगला, मैंने कहा " हाँ, हम मिले हैं, सौ - सौ दफा,
मैं धूल हूँ, तू कारवाँ। "


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - देखती हो, फिर अनदेखा करती हो,
मुझे पल में हिम्मत देकर, बेबस कर देती हो,
तुम्हारे होंठों से जो न हो पाए बयाँ, अपनी आँखों 
से कह जाती हो, उम्मीद करती हो के, मैं समझ जाऊँ
तुम्हारी आँखों की ज़ुबाँ, तो ज़रा तुम भी अपनी नज़रों से समझ जाओ ना मेरी यह इलतज़ा, के तेरे दिल में खाली सी है जो जगह, उस में मुझे राज़ सा रह जाने दे।


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - खुद की ही कमियाँ क्यों गिन लेता तू?
ज़ब सभी तेरे तारीफों के पुल है बांधते,
सीधा - सादा तरीका जानता तू, सभी को ख़ुशी देने का,
पर फिर भी, कई हो जाते जैसे नाखुश और ख़फ़ा तेरे से,
सोचता है तू कभी, के अकेलेपन, सुनापन, तन्हाई, से लिपट कर उसे खुद से कभी अलग ना करूँ
पर पल में, चाहिए तुझे घेर कर रखें लोगों के मेले।
कहाँ, क्या, क्यों, और कैसे? हो जाती भूल तुझसे?
जो एक को मनाने जाता तो, दूजा रूठता तुझसे
अब तो रातों की नींद ने भी तुझसे किनारा कर लिया,
गम ही गम के जैसे तूने जाम हो पी लिया।


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - सोच उसे, लिख लेता हूँ कुछ
उसे ध्यान में रखूँ, तो सवाल भी आते बहुत कुछ,
क्या, मेरे लिख पाने का वह बनी है  ज़रिया?
उसे देख, बोल, सुन, क्यों बदलता मेरा नज़रिया?
उसके साथ रहने से ज़िन्दगी में रंग है,
न होने पर, हो जाती बेरंग है,
कैसा, उससे यह रिश्ता है?
क्यों, मेरा सब उस पर ही चल कर खत्म हो कर,
टिकता है?




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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - वह समय फिर लौट आया है, ज़ब अयोध्या का घर - आँगन दीपों से जगमगाया है। बेसब्री भरे आँखें लिए लोगों के ज़ुबान पर एक ही नाम है, देवी सीता, भईया लक्ष्मण सहित, आनेवाले प्रभु श्री राम है, ढ़ोल - नगाड़े, शहनाई बज उठते चारों और, इस मंगल घड़ी में नाच - गाने, और ख़ुशी से प्रजा जन हो जाते सराबोर । संसार की पहली दिवाली को मनाने और देखने  न जाने कितनी लोग दूर -दूर से अयोध्या आए हैं , उत्साह के कारण, बिना थके वे भी ख़ुशी में मग्न बोल पड़ते, " हमारे प्रभु श्री राम आए हैं "

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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - क्या इस भटकन का कोई अन्त नहीं?
जिस में दिमाग़ काम करना बन्द कर दे,
करूँ क्या सही और क्या नहीं इस द्वन्द में फँसता चला जा रहा मैं, कोई ना दीखता मुझे सुनने वाला जो रखे अपना हाथ मेरे कन्धे पे और बोले "कह जो, तुझे कहना है, कह "


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - आईना हमने तोड़ दिया इस ख्याल से,
की शायद हमारी तकदीर बदल जाएगी,
हमें क्या पता था के टूटे आईने के हर टुकड़े में,
फिर वही तस्वीर नज़र आएगी।


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Quote by Navneet Bhengraj Bunty - दिल यह रो के गाता है तराना,
के क्यों, हर अपना हो जाता है सब से बेगाना?
कमी क्या रह जाती हमारे, उस पर लुटाने वाले प्यार में?
जो किसी नए के आने से, कन्नी काटते अपने पुराने यार से, तेरे दस्तक की राह तकती मेरी दिल की देहलीज़,
क्या हो गया, हमारा रिश्ता, तुम्हारी नज़र में एक दम बेकार की चीज़? तुझे सुने हो गए न जाने कितने बरसों, तेरी एक झलक पाने को लगाई थी बेकार की दौड़ मैंने तेरी गली में परसों। गुनाह हो जाता है क्या?अपने से पहले किसी और को चाहना? वह आखिर क्यों हमारी दुहाईयों को समझता अनदेखा करना?
चोट खा कर, भी उसके दर पर पड़ा, गाता हूँ अब भी यह गाना,
के क्यों, हर अपना हो जाता है सब से बेगाना?

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